हर समय व्यस्त और हर हाल में मस्त रहें - राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ जी, दशहरा मैदान के टाउन हॉल में घर को कैसे स्वर्ग बनाएं पर शुक्रवार को होंगे सत्संग प्रवचन...
Updated : February 12, 2026 10:24 AM
अर्जुन जयसवाल नीमच
धार्मिक
नीमच :- राष्ट्र-संत महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर जी महाराज ने कहा कि मरने के बाद हमें स्वर्ग मिलेगा कि नरक इसका तो पता नहीं, पर जो हर समय व्यस्त और हर हाल में मस्त रहना सीख जाते हैं, उनके लिए यही संसार बैकुंठ धाम बन जाता है। उन्होंने कहा कि जीवन परिवर्तन का नाम है। यहाँ कुछ भी स्थाई नहीं है, सब बदलने वाला है। जो इस हकीकत से रूबरू हो जाता है, वह सुख के साथ दुःख का, लाभ के साथ नुकसान का और संयोग के साथ वियोग का भी मजा लेना सीख जाता है। राष्ट्र-संत गुरुवार को श्री जैन श्वेतांबर भीडभंजन पार्श्वनाथ मंदिर ट्रस्ट श्री संघ द्वारा दशहरा मैदान के टाउन हॉल अटल बिहारी सभा कक्ष में आयोजित प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सुख दुख तो जीवन के दो पहलू हैं। उन्होंने कहा कि दुःख और तकलीफ यह तो पार्ट ऑफ लाइफ है जबकि उनसे सामना करना उनसे पार पाना और उसमें भी खुश रहना आर्ट ऑफ लाइफ है। उन्होंने कहा कि जीवन में तनाव को जगह नहीं दें, हमेशा मुस्कुराते रहें। मुस्कान से कोई नुकसान नहीं होता मुस्कान अनमोल है। सुखी जीवन के लिए जरूरी है कि किसी भी परिस्थिति में कभी मुंह से आह निकले हर परिस्थिति में सिर्फ वाह वाह ही निकलें। व्यक्ति के मरने के बाद हर व्यक्ति उसके चित्र पर स्वर्गीय लिखता है। कोई भी नरकीय नहीं लिखता है। इस हिसाब से तो नर्क पूरा ही खाली है। फोटो के नीचे स्वर्गीय लिखने से कोई स्वर्ग में नहीं जाता है अगर जीने की कला आ जाए यही जीवन स्वर्ग बन जाता है।
राष्ट्र-संत ने कहा कि सदाबहार खुश रहने का कीमिया मंत्र हैः हर हाल में मुस्कुराइए। अनुकूलता में हर कोई मुस्कुरा लेता है, पर जो प्रतिकूलता में भी मुस्कुराना सीख जाता है, वह धरती का सबसे सुखी इंसान बन जाता है। चाहे चित गिरे या पुट, चाहे लाभ हो या घाटा, चाहे कोई मान दे या अपमान, चाहे कोई कहना माने या ना माने, बेटा-बहू पूछकर काम करे चाहे बिना पूछे, पर हमारा तो एक ही सिद्धांत हो: हर हाल में आनंद, हर पल आनंद। उत्सव हमारी जाति बन जाए और आनंद हमारा गोत्र। संतप्रवर ने कहा कि आज का सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग। हम भीतर की शांति और आनंद के बारे में कम सोचते हैं, दुनियावालों की ज्यादा चिंता करते हैं। लोगों का तो नियम है टीका-टिप्पणी करना। यहाँ सहयोग करने वाले कम हैं, टक्कर देने वाले ज्यादा हैं। आगे बढ़ने की शुभकामनाएँ देने वाले कम हैं और नीचे गिराने वाले ज्यादा। इसलिए जब तक जिएँ गुलाब के फूल बनकर जिएँ।
राष्ट्र-संत ने जीवन को स्वर्ग बनाने का दूसरा मंत्र देते हुए कहा कि जो गया उसका रोना रोने की बजाय जो है उसका आनंद लेना सीख जाएं। संतप्रवर ने कहा कि जिंदगी जीने के दो तरीके हैं- या तो जो खोया है, उसका रोना राओ, या जो बचा है उसका आनंद मनाओ। तय आपको करना है, आप कैसी जिंदगी जीएंगे। जीवन का यह सिद्धांत बना लें कि जो मेरा है वो जाएगा नहीं और जो चला गया वो मेरा था ही नहीं। इस मंत्र को लेकर जो जीवन जीता है, वह जिंदगी में कभी दुखी नहीं होता। सुख आए तो हंस लो, और दुख आए तो हंसी में टाल दो- यही जीवन का मूलमंत्र है।
उन्होंने कहा कि अक्सर आदमी के पास जो है, उसका वह आनंद नहीं उठाता और जो नहीं है, उसका रोना रोकर दुखी होता रहता है। आज से अपने जीवन को यह पॉजीटिव मंत्र बना लें कि मैं आज से आह.. आह.. नहीं वाह... वाह...करुंगा। जीवन का तीसरा मंत्र यह बना लें- मैं हमेशा प्रकृति के विधान में विश्वास करुंगा। जीवन के हर पल-हर क्षण को मैं बहुत प्रसन्नता, आनंद से जीऊंगा। जो व्यक्ति जीवन में घटने वाली हर घटना को प्रेम से स्वीकार करता है, उसका जीवन आनंद से भर उठता है।
जिंदगी को हम भुनभुनाते हुए नहीं गुनगुनाते हुए जीएं। अपने जीवन का पहला मूलमंत्र इसे बना लें कि मैं यह उन्होंने कहा कि आज संकल्प लीजिए कि जीवन आह... आह... करके नहीं वाह... वाह... कहते जीऊंगा। जब भी हम वाह... कहते हैं तो यही जिंदगी हमारे लिए स्वर्ग बन जाती है और जब हम आह.. . कहते हैं तो जिंदगी नर्क-सी हो जाती है। अगर हमारे लिए थाली में भोजन आया है तो शुक्रिया अदा करो देने वाले भगवान का, अन्न उपजाने वाले किसान का और घर की भागवान का। जरा कल्पना करें आज से 50 साल पहले लोगों के पास आज जैसा भौतिक सुख भले कम था पर सुकून बहुत था। उस वक्त जब सुकून बहुत था, तो आदमी बड़े चैन से सोता था। आज सुख है तो भी लोग पूरी रात चैन से सो नहीं पाते। आज आदमी की जिंदगी कैसी गजब की हो चुकी है, बेडरूम में एसी और दिमाग में हीटर। उन्होंने कहा कि पत्थर में ही प्रतिमा छिपी होती है, जरूरत केवल उसे हमें तराशने की है। लगन, उमंग, उत्साह हो तो मिट्टी से मंगल कलश, बांस से बांसुरी बन जाती है। यह हमारी जिंदगी परम पिता परमेश्वर का दिया प्रसाद है, हम भी इसका सुंदर निर्माण कर सकते हैं। जीवन के हर क्षण, हर पल को हमें आनंद-उत्साह से भर देना चाहिए, अगर प्रेम, आनंद-उल्लास, माधुर्य से जीना आ जाए तो आदमी मर कर नहीं जीते-जी स्वर्ग को पा सकता है। इससे पूर्व डॉ मुनि श्री शांति प्रिय सागर जी महाराज ने कहा कि कुछ लोग खाने के लिए जीते हैं तो कुछ लोग जीने के लिए खाते हैं। जो ज्यादा खाते हैं वे कम जीते हैं जो कम खाते हैं वे ज्यादा जीते हैं। स्वाद के लिए खाना पाप है, जीने के लिए खाना बुद्धिमानी है और संयम जीवन जीने के लिए खाना साधना है। अगर हम घर का बना हुआ खाना खाएंगे तो ज्यादा स्वस्थ रहेंगे और बाजार का खाएंगे तो पेट भी बर्बाद होगा और बीमारियाँ भी फ्री में आएंगी। अगर कोई रसोइयों के हाथों का खाना पाँच दिन लगातार खा ले तो वह गारन्टेड बीमार पड़ेगा। हम हितकारी, सीमित और ऋतु अनुसार भोजन लें। मिठाइयाँ और तली हुई चीजों को सप्ताह में अधिकतम एक बार लें। चुटकी लेते हुए संतश्री ने कहा कि हमारा पेट क्रबिस्तान थोड़े ही है जो आए जैसा डालते जाएं। आखिर पचेगा तो उतना ही जितनी हमारी पाचन क्षमता है बाकी तो सब वेस्ट मेटेरियल बनकर सवेरे वाली गाड़ी से निकल जाएगा फिर ज्यादा खाने से क्या लाभ! उन्होंने कहा कि स्वस्थ, प्रसन्न एवं मधुर जीवन का पहला पायदान है निरोगी काया। अगर व्यक्ति बीमार होने से पहले ही शरीर के प्रति जागरूक रहे तो वह हमेशा रोगों से बचा हुआ रहेगा। शरीर केवल शरीर नहीं है वरन् परमात्मा का मंदिर है। जिस ईट, चूने, पत्थर के मंदिर को हम बनाते हैं, उसकी तो हम पूरी हिफाजत करते हैं, वहाँ पर कोई गलत चीज नहीं चढ़ाते हैं और जिस शरीर रूपी मंदिर को परमात्मा ने स्वयं बनाया फिर उसमें हम गुटखा, जर्दा, शराब जैसी गलत चीजें क्यों चढ़ा देते हैं। अगर व्यक्ति शरीर का मंदिर की तरह ध्यान रखना शुरू कर दे तो उसे कभी डॉक्टरों की शरण में जाना नहीं पड़ेगा। वरन् वह स्वयं अपना चिकित्सक बन जाएगा। कार्यक्रम का श्री गणेश अध्यक्ष अनिल नागौरी, मनोहरसिंह लोढ़ा, गोवर्धनलाल बाफना, अनिल चौधरी नयागांव, वीरेन्द्र पटवा, राजेश मानव, संतोष चोपड़ा, दिलीप डूंगरवाल, पारस छाजेड़ द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया । मंच संचालन मनीष कोठारी ने किया। राष्ट्रसंत के कल दशहरा मैदान के टाउन हॉल में घर को कैसे स्वर्ग बनाएं पर सुबह 9.15 से 11 बजे तक सत्संग प्रवचन आयोजित होंगे।
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