मां की ममता का स्थान संसार में सर्वोच्च होता है - चंद्र देव महाराज, राधा कृष्ण मंदिर में श्रीमद् भागवत कथा की ज्ञान गंगा प्रवाहित...
धार्मिक

अर्जुन जयसवाल नीमच
Updated : May 20, 2025 06:29 PM

नीमच :- मां चाहे कितना ही दुःख सहन कर ले लेकिन अपनी संतान को कभी कष्ट नहीं होने देती है। मां स्वयं गिले में सोती है लेकिन संतान को सुखे में सुलाती है। मां की ममता का स्थान संसार में सर्वोच्च होता है। बेटा बड़ा होकर के कोई भी अप शब्द कह दे तो भी मां उसका कभी बुरा नहीं चाहती है।संसार में मां से बड़ा कोई नहीं होता है।यह बात भागवत आचार्य पंडित चन्द्र देव महाराज (सोनियाणा वाले )ने कही।वे श्री चंद्र वंशी ग्वाला गवली समाज के तत्वावधान में स्कीम नंबर 9 स्थित राधा कृष्ण मंदिर में तृतीय सामूहिक गंग भोज के पावन उपलक्ष्य में मनीराम बिजो बाई दिवान की पावन स्मृति में आयोजित श्री मद् भागवत कथा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि राधा भक्ति है यदि हम भक्ति को अपनाएंगे तो कृष्ण अपने आप चले आएंगे। हमें अपने साथ जो व्यवहार पसंद नहीं है वह हमें दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। 6 वर्ष की अल्पायु में ध्रुव ने कठिन तपस्या कर भगवान की गोद और हजारों वर्षों का राज का वरदान प्राप्त किया था। यदि हम मंदिर में प्रतिदिन भक्ति करने जाएंगे तो लोगों की दृष्टि में आएंगे। तो हम भाग्यशाली है। लोगों की नजर हम पर पड़ती है तो एक दिन भगवान की नजर भी हम पर पड़ेगी तो हमारा कल्याण हो जाएगा। सत्संग और मंदिर में जाने से जो रोकता है वह हमारा शत्रु होता है। धन हमारे पास कभी स्थाई नहीं रहता है। धन कुछ पल के लिए हमारे पास आता है और वापस चला जाता है धन हमारे पास नहीं रहता है जब हम उसके बारे में सोच कर रोते हैं। दूसरों के आनंद के लिए स्वयं को पाप कभी नहीं करना चाहिए। राम नाम के जप के कारण वाल्मीकि ब्रह्म में समा गए थे। सात्विक समर्पण भाव से ही कथा करवाना चाहिए तभी उसका फल मिलता है। दूसरे के दुःख से दुःखी हो जाए ।और दूसरों के सुख से सुखी हो जाए वही सच्चा संत होता है। जिसके विचार देश और समाज की भलाई के लिए हो वह सद्गुरु सच्चा संत होता है। संत एक विचारधारा है एक शैली है। भगवा वस्त्र और जट्टा से कोई भी व्यक्ति संत नहीं होता है। वह अपने संस्कार और गुणों से संत होता है। साधुता कपड़ों में नहीं विचारों में होनी चाहिए। मान अपमान नहीं देखता वही सच्चा साधु होता है। मनुष्य जीवन में व्यक्ति यदि धर्म शास्त्रों के अनुरूप अपने जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन करें तो उसे उसके जीवन में कभी दुःख नहीं आते हैं। मनुष्य को मधुर वचनों का संग्रह करना चाहिए लेकिन मनुष्य कटू वचनों का संग्रह कर लेता है यदि परिवार का मुखिया शांत और सहनशील हो तो परिवार सुखी रहता है। जहां सम्मान पूर्वक आमंत्रण दिया जाए वहां चाहे पत्थर भी बरसते हो तो जाना चाहिए लेकिन यदि सम्मान पूर्वक आमंत्रण नहीं दिया जाए वहां चाहे सोना भी मिलता हो तो नहीं जाना चाहिए। जमाई धर्म पुत्र होता है और बहू धर्म की बेटी होती है। यदि बहू सास को मां और सास यदि बहु को बेटी माने तो घर स्वर्ग बन सकता है। मंदिर सत्संग और दुःखी के घर बिना बुलाए जाना चाहिए। गुरु और पिता के घर यदि कोई बीमार हो तो बिना बुलाए भी जा सकते हैं। आधुनिक युग में गुरु स्वार्थी और शिष्य लोभी है तो समझ में किसी का भी भला नहीं हो सकता है।मानव गलतियों का पुतला है। जन्म लेने के बाद जीवन पर्यंत वह हर बार एक नई गलती करता रहता है और उससे शिक्षा लेकर अपने जीवन को सुधारता रहता है। संतों का समागम कथा में मिलता है। जो संत होता है वही कथा सत्संग में आता है।दक्ष प्रजापति को अपने अभिमान के कारण विनाश का सामना करना पड़ा था। हरि की कथा श्रवण करने से मन पवित्र होता है पाप कर्म दूर होते हैं। जो नारी पति का आदर करती है वह पति परमेश्वर के समान होता है। अभिमान के कारण रावण कंस कोरव
का भी विनाश हो गया था। सत्ता पद का कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए कि आज है और कल नहीं, सदैव विनम्र रहना चाहिए विनम्र व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता है। जीवन में कभी भी पत्नी का अपमान नहीं होना चाहिए पत्नी के सम्मान की रक्षा पति को सदैव करना चाहिए। जीवन पर्यंत पाप करने वाले अजामिल ने अपने पुत्र का नाम नारायण रखा और नारायण नाम का स्मरण किया तो उसका भी कल्याण हो गया था। राम नाम की शक्ति इतनी होती है कि पापी भी यदि राम नाम का नाम ले तो उसका भी कल्याण हो सकता है।भक्ति तपस्या खुले में ही करना चाहिए ताकि दूसरे भी प्रेरणा ले सके। पाप करने वाले से पाप देखने वाला 10 गुणाअधिक अपराधी होता है। गौमाता की रक्षा के लिए शिवाजी ने 30 मुगल सैनिकों को युद्ध प्राणांत कर दिया था। आरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया।
ये थे धार्मिक प्रसंग श्रीमद्भागवत कथा में पंडित चंद्र देव महाराज ने महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी,संभाजी राव, अजामिल,नारद मुनि,जड़भरत,बलिप्रथा ,ऋषभदेव, 24अवतार, तुलसीदास, शिव पार्वती प्रसंग ,राम कथा, सुनयना, कैलाश पर्वत, शंकर पार्वती, कार्तिक, गणेश, नंदी, सनातन धर्म, धर्मशास्त्र, आदि धार्मिक विषयों के वर्तमान परिपेक्ष्य के महत्व पर प्रकाश डाला।श्रीमद् भागवत कथा पोथी पूजन आरती में रमेश चंद्र मुन्नी बाई दिवान परिवार के सदस्यों एवं क्षेत्र के श्रद्धालु भक्तों सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
का भी विनाश हो गया था। सत्ता पद का कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए कि आज है और कल नहीं, सदैव विनम्र रहना चाहिए विनम्र व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता है। जीवन में कभी भी पत्नी का अपमान नहीं होना चाहिए पत्नी के सम्मान की रक्षा पति को सदैव करना चाहिए। जीवन पर्यंत पाप करने वाले अजामिल ने अपने पुत्र का नाम नारायण रखा और नारायण नाम का स्मरण किया तो उसका भी कल्याण हो गया था। राम नाम की शक्ति इतनी होती है कि पापी भी यदि राम नाम का नाम ले तो उसका भी कल्याण हो सकता है।भक्ति तपस्या खुले में ही करना चाहिए ताकि दूसरे भी प्रेरणा ले सके। पाप करने वाले से पाप देखने वाला 10 गुणाअधिक अपराधी होता है। गौमाता की रक्षा के लिए शिवाजी ने 30 मुगल सैनिकों को युद्ध प्राणांत कर दिया था। आरती के बाद प्रसाद वितरण किया गया।
ये थे धार्मिक प्रसंग श्रीमद्भागवत कथा में पंडित चंद्र देव महाराज ने महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी,संभाजी राव, अजामिल,नारद मुनि,जड़भरत,बलिप्रथा ,ऋषभदेव, 24अवतार, तुलसीदास, शिव पार्वती प्रसंग ,राम कथा, सुनयना, कैलाश पर्वत, शंकर पार्वती, कार्तिक, गणेश, नंदी, सनातन धर्म, धर्मशास्त्र, आदि धार्मिक विषयों के वर्तमान परिपेक्ष्य के महत्व पर प्रकाश डाला।श्रीमद् भागवत कथा पोथी पूजन आरती में रमेश चंद्र मुन्नी बाई दिवान परिवार के सदस्यों एवं क्षेत्र के श्रद्धालु भक्तों सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।