सरकारी नीतियों से श्रमिकों में असंतोष सीटू ने गांधी वाटिका में मनाया मजदूर दिवस...
Updated : May 01, 2026 12:17 PM
अर्जुन जयसवाल नीमच
सामाजिक
नीमच :- 1 मई 2026 मजदूरों का अंतरराष्ट्रीय त्यौहार मजदूर दिवस आज नीमच में भी सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन सीटू ने स्थानीय गांधी वाटिका मनाया। इस अवसर पर ट्रेड यूनियन के प्रमुख साथी उपस्थित थे। साथियों को संबोधित करते हुए कामरेड विजय बैरागी ने बताया कि मई दिवस की शुरुआत 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर में मई महीने के पहले सप्ताह में हजारों औद्योगिक मजदूरों द्वारा की गई हड़ताल से हुई थी। सड़कों पर आकर 8 घंटे का कार्य दिवस और कार्यस्थल पर सम्मानजनक व्यवहार की मांग पर किये गए रोष प्रदर्शनों से निपटने के लिए पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में कई मजदूर शहीद हुए थे । बाद में हिंसा फैलाने के मनघड़ंत आरोपों में मुकदमें चलाकर 6 श्रमिक नेताओं को मृत्यु दंड दिए गया था । तभी से दुनिया के श्रमिक अपने उन शहीद साथियों को याद करते हैं जिनकी कुर्बानियों से इस वैज्ञानिक और मानवीय दिनचर्या को अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता मिली कि आठ घंटे काम, आठ घंटे नींद और आठ घंटे परिवार के साथ बिताना। कामरेड निरंजन गुप्ता राही ने कहा कि 1889 में पेरिस में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के आह्वान पर 1890 में 1 मई को पहली बार मई दिवस दुनिया भर में मनाया गया। तब से सभी देशों के श्रमिक इस दिन अपने -अपने शहरों में इकठ्ठे होकर शोषण, उत्पीड़न और गैर बराबरी वाली व्यवस्था को बदल कर श्रम का पूरा मूल्य गरीमामय जीवन व समतामूलक समाज की स्थापना के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता प्रकट करते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता कामरेड किशोर जेवरिया ने अपनी बात रखते हुए कहा भारत के श्रमिक आंदोलन पूंजीवादी शोषण की समाप्ति, साम्राज्यवाद की नव उपनिवेशवादी आक्रामकता के साथ ही सांप्रदायिक और जातिवादी फूट पैदा करने वाले षडयंत्रों के खिलाफ अपनी एकता प्रदर्शित करते हैं। वे अपने शासकों द्वारा साम्राज्यवाद के साथ किये जा रहे समर्पण के विरोध में अपने देश की संप्रभुता की हिफाजत में खड़े होते हैं और युद्धों का विरोध करते हुए विश्व शांति के पक्ष में संकल्प लेते हैं। कामरेड सुनील शर्मा ने कहा ध्यान रहे कि 2026 का मई दिवस अपने आपमें अभूतपूर्व परिस्थितियों में आया है। हम देख रहे हैं कि राष्ट्रीय राजधानी के चारों ओर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान यहां तक की मध्य प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में श्रमिकों का असंतोष सड़कों पर प्रकट होता देखा जा सकता है। आटोमोबाइल, गारमेंट उधोग, रिफाइनरी एवं पावर प्लांट आदि में काम करने वाले हजारों युवा श्रमिकों की दो मुख्य मांगें हैं। पहली न्यूनतम वेतन में वृद्धि और दूसरी आठ घंटे का कार्य दिवस कोई भी इन दोनों मांगों को अनुचित नहीं कह सकता। नितेश यादव ने कहा कि अफसोस की बात है कि मानेसर, गुड़गांव, भिवाड़ी और नोएडा सिंगरौली में फूटे आक्रोश को शांत करने के लिए श्रमिकों की सुनवाई करने की बजाय उन पर पुलिस बल का प्रयोग किया गया है। बहुत सारे मजदूरों को चोटें लगी जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं ।अंधाधुंध गिरफ्तारी करके महिलाओं समेत बहुत सारे जेलों में डाल दिए गए हैं। इनमें भारतीय न्याय संहिता की गंभीर आपराधिक धाराएं भी लगाई गई हैं। गिरफ्तार लोगों के परिजनों तक को सूचित नहीं किया गया जो उनकी तलाश में भटकते रहे हैं ।
कामरेड शैलेंद्र सिंह ठाकुर ने बात को आगे बढ़ते हुए कहा कि ऐसे श्रमिक विस्फोट अब और प्रदेशों में भी फैलते जा रहे हैं। पिछले दिनों ऐसी ही स्थिति पानीपत रिफाइनरी के श्रमिकों के आकस्मिक विस्फोट के रूप में भी देखने को मिली थी। इसमें आश्चर्य नहीं कि सत्ता पक्ष ने, श्रमिकों के इस स्वत:स्फूर्त असंतोष के पीछे आतंकवादी ताकतों की साजिश बताकर श्रमिक असंतोष को सनसनीखेज दिखाने की कोशिश की, लेकिन असंतोष की आग अभी भी आगे से आगे सुलग रही है। पश्चिम एशिया में साम्राज्यवादी युद्ध के चलते पैदा हुए ऊर्जा संकट के कारण गुजरात व अन्य प्रदेशों से बडी़ संख्या में मजदूर पलायन कर गए हैं। बीएसएनएल के साथी कैलाश चंद्र सेन ने कहा कि इस समय अमेरिका-इजराईल ने ईरान पर भयानक युद्ध थोपने का विनाशकारी कदम उठाने का जो दुस्साहस किया है उसका खामियाजा पूरे विश्व के आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। हमेशा की तरह पूंजीवादी सिस्टम अपने अंतर्निहित संकट के दृष्टिगत अपने मुनाफे की दर बनाए रखने हेतु संकट का बोझ किसान व मजदूर वर्ग के ऊपर डालने के रास्ते पर चल रहा है। हाल में गैस की कीमतें बढ़ने से, कंपनियों को अपने मुनाफे बनाए रखने के लिए श्रमिकों के काम के घंटे बढ़ाना एक मात्र आसान विकल्प दिखाई देता है। औद्योगिक मजदूर एकता यूनियन के मुकेश बाबा ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के श्रमिकों को खाड़ी युद्ध से ऊर्जा के दाम बढ़ने और बेतहाशा महंगाई के कारण 8-10 हजार रुपये के मामूली वेतन में गुजारा करना असंभव हो गया है। मकानों के किरायों में बढ़ोतरी, बच्चों की स्कूल फीस, स्वास्थ्य खर्च आदि को देखते हुए मजदूर अपना पेट काटकर भी परिवार का गुजारा नहीं चला सकते हैं। राज्य सरकारों ने आंदोलन भड़कने के उपरांत हाबड़ -तोबड़ में कई सालों से लंबित न्यूनतम वेतन में जो वृद्धि की हैं वह न केवल अपर्याप्त हैं बल्कि उनका अनुपालन नहीं करवाया जाता है। इसके अलावा एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जिसे "पीस रेट" के तहत लगाया हुआ है। संगठित क्षेत्र का यह ऐसा मजदूर है जो असंगठित है। इनकी कोई वैधानिक सामाजिक सुरक्षा नहीं है न ही दुर्घटनाओं से कोई सुरक्षा तथा बहुत ही जोखिमपूर्ण कार्य स्थितियों में इन्हें काम करना पड़ता है। नरेंद्र कमल वाले बताया कि शौचालय जाने की एवज में भी इनके पैसे काटे जाने जैसे अमानवीय व्यवहार की खबरें, 1886 की शिकागो जैसी हालात की याद ताजा करवा देती हैं । इस स्थिति में निर्मम शोषण के शिकार इन तबकों का संगठित होना बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि नीमच और उसके आसपास के क्षेत्र में भी मजदूरों से 12-12 घंटे काम दिया जा रहा है कई औद्योगिक संस्थानों में आज तक न्यूनतम वेतन का एरियर भी नहीं दिया गया है आशा कार्यकर्ता सुनीता धाकड़ ने कहा कि नव -उदारवाद के दौर में कारपोरेट के मंसूबों के चलते वर्ष 2020 में सभी 29 श्रम कानूनों को हटाकर उनकी जगह पर चार श्रम संहिता (लेबर कोड) संसद में पारित कर दिए गए। तमाम मुख्य ट्रेड यूनियनों के तीखे विरोध के बावजूद 21 नवंबर 2025 में इन्हें लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी गई। देश की सभी प्रमुख ट्रेड यूनियनों का मानना है कि चार श्रम संहिता लागू होने की स्थिति में काम के घंटों में वृद्धि होगी, यूनियनों का पंजीकरण करवाना बहुत कठिन होगा, हड़ताल करने पर दंडात्मक कारवाई की जा सकेगी, स्थाई रोजगार की बजाय ठेका प्रणाली का प्रचलन बढ़ेगा और श्रमिकों को लगाना व हटाना आसान होगा। यही नहीं बल्कि 300 तक श्रमिक संख्या वाले उद्योगों को श्रम विभाग की अनुमति के बिना मजदूरों को हटाने की छूट रहेगी। इस सबके चलते श्रम विभाग निरर्थक हो कर रह जाएगा और श्रमिकों की स्थिति कमोवेश बंधुवा मजदूर जैसी बनना निश्चित है। वैसे ही काम वेतन पर गुजारा कठिन हो रहा था और ऊपर से भयानक रूप से बढ़ती महंगाई ने जीवन और मुश्किल कर दिया है।
युवा किसान नेता राधेश्याम नागदा ने कहा कि गौरतलब है कि लेबर कोड के पक्ष में जैसी थोथी दलीलें दी जा रही हैं, ठीक वैसी ही धूर्ततापूर्ण दलीलें तीन कृषि कानूनों के संबंध में भी दी गई थी जिन्हें किसानों ने आंदोलन करके वापिस करवाया था। स्वागत योग्य बात है कि इस समय मजदूरों के साथ किसान संगठन भी खड़े हो रहे हैं और कारपोरेट सांप्रदायिक गठजोड़ के खिलाफ देश भर में एकता स्थापित हो रही है। भविष्य में इस एकता के आशाजनक संकेत आएंगे। इस अवसर अरिजीत यादव, जितेंद्र वर्मा, चिंटू मित्तल, दीपक भट्ट, नीरज जोशी, मनोहर वर्मा इत्यादि
कामरेड शैलेंद्र सिंह ठाकुर ने बात को आगे बढ़ते हुए कहा कि ऐसे श्रमिक विस्फोट अब और प्रदेशों में भी फैलते जा रहे हैं। पिछले दिनों ऐसी ही स्थिति पानीपत रिफाइनरी के श्रमिकों के आकस्मिक विस्फोट के रूप में भी देखने को मिली थी। इसमें आश्चर्य नहीं कि सत्ता पक्ष ने, श्रमिकों के इस स्वत:स्फूर्त असंतोष के पीछे आतंकवादी ताकतों की साजिश बताकर श्रमिक असंतोष को सनसनीखेज दिखाने की कोशिश की, लेकिन असंतोष की आग अभी भी आगे से आगे सुलग रही है। पश्चिम एशिया में साम्राज्यवादी युद्ध के चलते पैदा हुए ऊर्जा संकट के कारण गुजरात व अन्य प्रदेशों से बडी़ संख्या में मजदूर पलायन कर गए हैं। बीएसएनएल के साथी कैलाश चंद्र सेन ने कहा कि इस समय अमेरिका-इजराईल ने ईरान पर भयानक युद्ध थोपने का विनाशकारी कदम उठाने का जो दुस्साहस किया है उसका खामियाजा पूरे विश्व के आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। हमेशा की तरह पूंजीवादी सिस्टम अपने अंतर्निहित संकट के दृष्टिगत अपने मुनाफे की दर बनाए रखने हेतु संकट का बोझ किसान व मजदूर वर्ग के ऊपर डालने के रास्ते पर चल रहा है। हाल में गैस की कीमतें बढ़ने से, कंपनियों को अपने मुनाफे बनाए रखने के लिए श्रमिकों के काम के घंटे बढ़ाना एक मात्र आसान विकल्प दिखाई देता है। औद्योगिक मजदूर एकता यूनियन के मुकेश बाबा ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के श्रमिकों को खाड़ी युद्ध से ऊर्जा के दाम बढ़ने और बेतहाशा महंगाई के कारण 8-10 हजार रुपये के मामूली वेतन में गुजारा करना असंभव हो गया है। मकानों के किरायों में बढ़ोतरी, बच्चों की स्कूल फीस, स्वास्थ्य खर्च आदि को देखते हुए मजदूर अपना पेट काटकर भी परिवार का गुजारा नहीं चला सकते हैं। राज्य सरकारों ने आंदोलन भड़कने के उपरांत हाबड़ -तोबड़ में कई सालों से लंबित न्यूनतम वेतन में जो वृद्धि की हैं वह न केवल अपर्याप्त हैं बल्कि उनका अनुपालन नहीं करवाया जाता है। इसके अलावा एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जिसे "पीस रेट" के तहत लगाया हुआ है। संगठित क्षेत्र का यह ऐसा मजदूर है जो असंगठित है। इनकी कोई वैधानिक सामाजिक सुरक्षा नहीं है न ही दुर्घटनाओं से कोई सुरक्षा तथा बहुत ही जोखिमपूर्ण कार्य स्थितियों में इन्हें काम करना पड़ता है। नरेंद्र कमल वाले बताया कि शौचालय जाने की एवज में भी इनके पैसे काटे जाने जैसे अमानवीय व्यवहार की खबरें, 1886 की शिकागो जैसी हालात की याद ताजा करवा देती हैं । इस स्थिति में निर्मम शोषण के शिकार इन तबकों का संगठित होना बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि नीमच और उसके आसपास के क्षेत्र में भी मजदूरों से 12-12 घंटे काम दिया जा रहा है कई औद्योगिक संस्थानों में आज तक न्यूनतम वेतन का एरियर भी नहीं दिया गया है आशा कार्यकर्ता सुनीता धाकड़ ने कहा कि नव -उदारवाद के दौर में कारपोरेट के मंसूबों के चलते वर्ष 2020 में सभी 29 श्रम कानूनों को हटाकर उनकी जगह पर चार श्रम संहिता (लेबर कोड) संसद में पारित कर दिए गए। तमाम मुख्य ट्रेड यूनियनों के तीखे विरोध के बावजूद 21 नवंबर 2025 में इन्हें लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी गई। देश की सभी प्रमुख ट्रेड यूनियनों का मानना है कि चार श्रम संहिता लागू होने की स्थिति में काम के घंटों में वृद्धि होगी, यूनियनों का पंजीकरण करवाना बहुत कठिन होगा, हड़ताल करने पर दंडात्मक कारवाई की जा सकेगी, स्थाई रोजगार की बजाय ठेका प्रणाली का प्रचलन बढ़ेगा और श्रमिकों को लगाना व हटाना आसान होगा। यही नहीं बल्कि 300 तक श्रमिक संख्या वाले उद्योगों को श्रम विभाग की अनुमति के बिना मजदूरों को हटाने की छूट रहेगी। इस सबके चलते श्रम विभाग निरर्थक हो कर रह जाएगा और श्रमिकों की स्थिति कमोवेश बंधुवा मजदूर जैसी बनना निश्चित है। वैसे ही काम वेतन पर गुजारा कठिन हो रहा था और ऊपर से भयानक रूप से बढ़ती महंगाई ने जीवन और मुश्किल कर दिया है।
युवा किसान नेता राधेश्याम नागदा ने कहा कि गौरतलब है कि लेबर कोड के पक्ष में जैसी थोथी दलीलें दी जा रही हैं, ठीक वैसी ही धूर्ततापूर्ण दलीलें तीन कृषि कानूनों के संबंध में भी दी गई थी जिन्हें किसानों ने आंदोलन करके वापिस करवाया था। स्वागत योग्य बात है कि इस समय मजदूरों के साथ किसान संगठन भी खड़े हो रहे हैं और कारपोरेट सांप्रदायिक गठजोड़ के खिलाफ देश भर में एकता स्थापित हो रही है। भविष्य में इस एकता के आशाजनक संकेत आएंगे। इस अवसर अरिजीत यादव, जितेंद्र वर्मा, चिंटू मित्तल, दीपक भट्ट, नीरज जोशी, मनोहर वर्मा इत्यादि
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